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Showing posts from July, 2020

इंसान क्या है ?

प्रश्न : इस युग मे इंसान क्या है ? उत्तर : किसी के लिए अमानत , तो किसी के लिए ज़मानत I किसी के लिए प्यार , तो किसी के लिए यार I किसी के लिए जुनून , तो किसी के लिए खून I किसी के लिए आशा , तो किसी के लिए निराशा I किसी के लिए फ़रिश्ता , तो किसी के लिए रिश्ता I किसी के लिए अपना , तो किसी के लिए सपना I किसी के लिए अमीर , तो किसी के लिए फकीर I किसी के लिए अभिमान , तो किसी के लिए अपमान I किसी के लिए पहचान , तो किसी के लिए अनजान I किसी के लिए सहारा , तो किसी के लिए नकारा I किसी के लिए भगवान , तो किसी के लिए इंसान I - संतोष पांडेय✍ 

दिल-ए-पुराण !

दिल-ए-पुराण   माई के माथे के सिन्दूर ने , बापू को वचनो मे बांधा है I दिल को कहा आखें होती है , ये प्रेम मे बन बैठा अंधा है ।। शक्ति के शक्ति का , शिवा को भी ज्ञान है । कहा रह गई कमी मुझमे , इस बात से दिल हैरान है ।। राधा के प्रेम का , कन्हैया भी गवाह है ।। तू चाहे मुझे भूल जाये , दिल को आज भी तेरी परवाह है ।। रिद्धी-सिद्धी बहनों के साथ , गणराया का स्नेह गहरा है ।। तुझसे जुड़ी हर एक यादों पर , इस दिल का कडा पहारा है ।। कलयुग में हर सीता को , राम का ही इन्तेज़ार है ।। चाहकर भी कुछ कर नहीं सकता , ये दिल कितना लाचार है ।। लक्ष्मी का सम्मान करना , नारायण का कर्तव्य है ।। तू साथ मेरे हो ना हो , तेरा नाम ही मेरे लिए पर्व है ।। - संतोष पांडेय✍

लेकिन हम व्यस्त है I

लेकिन हम व्यस्त है I  जरूरत है वास्तविकता की , लेकिन हम Likes मे व्यस्त है । जरूरत है वार्तालाप की , लेकिन हम Comments मे व्यस्त है । जरूरत है जागरूकता की , लेकिन हम Share - Post मे व्यस्त है । जरूरत है अनुभव की , लेकिन हम Insights मे व्यस्त है । जरूरत है बचाव - संवर्धन की , लेकिन हम Saved मे व्यस्त है । जरूरत है कला - प्रदर्शन की लेकिन हम Status - Story मे व्यस्त है । जरूरत है संघर्ष की , लेकिन हम Trending मे व्यस्त है । जरूरत है सच्चे मित्रों की , लेकिन हम Followers मे व्यस्त है । जरूरत है जान - पहचान की , लेकिन हम Block - Unblock मे व्यस्त है । जरूरत है आदर्शों की , लेकिन हम Cyber Bullying मे व्यस्त है । जरूरत है प्रकृति की , लेकिन हम Materials मे व्यस्त है । - संतोष पांडेय✍ 

कैसे तू भूल गया ?

कैसे तू भूल गया  ? किसीके तनीक बहकावे मे , कैसे तू फूल गया । सभी के भीतर बहें लाल लहू , कैसे तू भूल गया ।। हरणे के लिए किसीके प्राण, कैसे तू शूल हुआ । जीवनदायिनी जल-वायु एक है , कैसे तू भूल गया ।। जात-पात की बेड़ियों मे रहकर , कैसे तू अनुकूल हुआ । धर्म का सीख तो एक है , कैसे तू भूल गया ।। इस प्रेम-भाव की दुनिया मे , कैसे तू महसूल हुआ । हमे बनाना है अपनों का आधार , कैसे तू भूल गया ।। मिथ्या अभिमान के फंदे मे , कैसे तू झूल गया I कर्म सर्वोपरी के ज्ञान को , कैसे तू भूल गया ।। होकर एक बुद्धिजीवी प्राणी , अज्ञानता मे कैसे घुल गया । इंसान होकर इंसानियत को , कैसे तू भूल गया ।। - संतोष पांडेय✍  महसूल - कर ( Tax ) शूल - काटा

सामाजिक माध्यम ( Social Media ) !

सामाजिक माध्यम ( Social Media ) आज के युग में सार्वजनिक माध्यम का अर्थ है - तर्कहीन राष्ट्र प्रेम जाति वाद पर दंगे शाब्दिक निषेध अर्थहीन आलोचना ज्ञानहीन धर्मनिष्ठा दिखावटी प्रेम अनुपयोगी संगठन अश्लील वाणी झूठा स्वाभिमान गुमराहवादी समाचार अंधा कानून अनैतिक प्रशासन अपुर्ण ज्ञान अर्थात , तकनीकी हमे बर्बाद नहीं कर रही, हम तकनीकी को बर्बाद कर रहे है I इसीलिए जरूरत है तो उसके सही उपयोग का I - संतोष पांडेय ✍

रंडी !

रंडी जाने है हमारे घर को , बदन सौदा का मंडी । वैसे नाम में क्या रखा है , कहते है सब हमे - " रंडी " । रात के पहर में , होते है सब मग्न । कितना भी पहने वस्त्र , नजरो में है हम नग्न । हवस मिटाने आते सब , भुलाकर अपना धरम । वैश्य वृत्ती है कर्म हमारा , फिर कैसे हुए हम बेशरम ।। क्या करे हम भी , पापी पेट का सवाल है । स्त्री श्रेणी में होकर भी, फिर मचा क्यू बवाल है ।। सदियों से चला आ रहा , यह एक कडवा सत्य है । शांत करे हम भूख को , बस यही एक तथ्य है ।। क्यू दिया दुनिया ने , हमे यह पहचान । सदियों से हम तरस रहे , पाने के लिए सम्मान ।। नहीं होता कोई भी , अच्छा या बुरा धंधा । खेल है ये विचारो का , जो करदे सोच को गंदा ।। एक बात कहती हू अंत मे , हमे है खुद पर अभिमान । लेकर थोड़ा ज्ञान दोस्तों , और बन जाओ इंसान ।। - संतोष पांडेय ✍

सोनू-धनू !

सोनू-धनू दो भाई थे , करते खुब लड़ाई थे I सोनू धनू से लंबू था , धनू सोनू से टिंगू था I सोनू धनू से कुछ कहता था , तो धनू भी चूप नहीं रहता था I बोल बीच मे पड़ता था , और सोनू से लड़ बैठता था I एक दिन सोनू हुआ खड़ा , और धनू पर टूट पड़ा I छिड़ गई महाभारत भारी , गिरी मेज कुर्सी सारी I यह सुनकर माँ घबराई , झाडू लेकर बाहर आई I दोनों को दिए दो-दो जड़कर , कहा क्या मिला तुम्हें लड़कर I खबरदार जो फिर कभी लड़े , बंद करो अब यह सब झगड़े । दोनों ने हंसकर हाथ मिलाई , इसी में थी सोनू-धनू की भलाई । - संतोष पांडेय ✍

संगीत - एक समाधान !

संगीत - एक समाधान 🎵 शाम के ६:०० बजे एक संदेश आया - " Hi Santosh , tomorrow we have delivery. Can you please fix the bug by today itself. " मैं और मेरे एक सहपाठी को तो पता भी नहीं की Bug क्या है I अचानक से आए इस संदेश ने दिमाग ही बंद कर दिया l फिर हमने अपने-अपने तरीके से समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की, लेकिन सभी नाकाम हो रहे थे I कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करे I अंत मे हमने एक मध्यंतर लेने का फैसला किया l फिर मैंने भी Spotify पर एक मस्त गाना लगाया और Headphones लगाकर बाल्कनी में घूमने लगा l गाने का नाम था - " Walk " l गाना सुनते-सुनते अचानक से कुछ खयाल आया और मैं झट से अपने सिस्टम के पास आकर Bug Fix करने लगा l विश्वास करना मुश्किल होगा आप सभी को, लेकिन २:०० मिनट का काम था l समस्या का समाधान भी सरल था एकदम l लेकिन तनाव की वजह से विचार क्षमता सीमित सी हो गयी थी, जिसके फलस्वरुप हम समाधान देख नहीं पा रहे थे I इसलिए जब भी समस्या का समाधान ना मिले, एक ब्रेक ले और पुनः समस्या के समाधान पर शुरूवात से विचार करे l समय - ८:३७ मध्याह्न वार - मंगलवार - संतोष पांडेय...

जोकर !

जोकर फटा पायजमा , कुर्ता ढीला ; ऊँचा टोपा , रंग रंगीला । क्या-क्या स्वांग बनाता जोकर ; सर्कस में जब आता जोकर ।। अजब-अजब करतब दिखलाता ; हसा-हसा कर पेट फुलाता । गिर-संभलकर नाचता जोकर ; सर्कस में जब आता जोकर ।। बचपन की यादें 😁 - संतोष पांडेय✍ 

रावण कहा है ?

रावण कहा है ? मैंने सुना है, रावण बुरा इंसान था ? उसके दस सिर थे, जिसमें उसके दस गुणों का वास था I क्या यह भी सत्य है की रावण महा-बलशाली, महान-भक्त और एक बुद्धिजीवी था I परंतु मैं क्या बोलता हू, क्या हम सब जानते है असली रावण कहा है और उसकी दस सिरों की विशेषताएं क्या है ? काम, क्रोध, मोह, लोभ, मत्सरता, मानस, बुद्धि, चित्त, अहंकार, मद - यह है रावण के दस सिर ! रावण ने अपने हर एक भावना के लिए एक अलग सिर नियुक्त किया था I लेकिन हम इंसान ऐसे बुद्धिजीव है जिनके एक ही सिर में ये सारी भावनाओ का वास है और भावनाओ के इसी जाल में फंसकर हमारी मानसिक अवस्था अमानवीय होती जा रही है I हम बेकार में हम रावण को बाहरी दुनिया मे खोजते है I हमे लगता है रावण मर चुका है I लेकिन एक बात हम भूल जाते है कि आज भी हर इंसान के भीतर एक रावण है, जो आज भी जिंदा है I अपितु, आज का इंसान रावण से भी कई गुना भयानक है I वो ना ही पूरी तरह रावण है और नाही राम I इसी उलझन की वजह से ना इंसान घर घर का है, ना घाट का ! हमे पहले अपने भीतरी राक्षस को मारना होगा I अपनी भावनाओ पर नियंत्रण पाना होगा I तब जाकर कहीं इस दुनिया मे कहीं अमन ...

आंकना !

आंकना मुझे पढ़ना पसंद नहीं ,  मतलब मै अनपढ़ ? मुझे लड़ना पसंद नहीं , मतलब मै कमजोर ? मुझे रोना पसंद नहीं , मतलब मै पत्थर ? मुझे बोलना पसंद नहीं , मतलब मै गूंगा ? मुझे हँसाना पसंद नहीं , मतलब मै दुखी ? मुझे स्तन-योनी पसंद नहीं , मतलब मै नामर्द ? मुझे भगवान पसंद नहीं , मतलब मै नास्तिक ? - संतोष पांडेय ✍