कैसे तू भूल गया ?
कैसे तू भूल गया ?
कैसे तू फूल गया ।
सभी के भीतर बहें लाल लहू ,
कैसे तू भूल गया ।।
हरणे के लिए किसीके प्राण,
कैसे तू शूल हुआ ।
जीवनदायिनी जल-वायु एक है ,
कैसे तू भूल गया ।।
जात-पात की बेड़ियों मे रहकर ,
कैसे तू अनुकूल हुआ ।
धर्म का सीख तो एक है ,
कैसे तू भूल गया ।।
इस प्रेम-भाव की दुनिया मे ,
कैसे तू महसूल हुआ ।
हमे बनाना है अपनों का आधार ,
कैसे तू भूल गया ।।
मिथ्या अभिमान के फंदे मे ,
कैसे तू झूल गया I
कर्म सर्वोपरी के ज्ञान को ,
कैसे तू भूल गया ।।
होकर एक बुद्धिजीवी प्राणी ,
अज्ञानता मे कैसे घुल गया ।
इंसान होकर इंसानियत को ,
कैसे तू भूल गया ।।
- संतोष पांडेय✍
महसूल - कर ( Tax )
शूल - काटा
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