"क्या मैं तुम्हारी नौकरानी हूँ?" - आधुनिक रिश्तों में पुरुष की मौन व्यथा
प्रस्तावना आज का दौर बदलाव का दौर है। महिला सशक्तिकरण और स्त्री अधिकारों पर होने वाली चर्चाएं समाज की प्रगति के लिए अनिवार्य हैं। लेकिन, समानता की इस न्यायपूर्ण यात्रा में एक ऐसा पक्ष भी है जो धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहा है- 'पुरुष'। आज का मध्यमवर्गीय पुरुष अक्सर जिम्मेदारियों के अंतहीन चक्र और अपनी भावनाओं के दमन के बीच फंसा हुआ है। अक्सर घरों में तकरार के दौरान एक जुमला ढाल की तरह इस्तेमाल किया जाता है- "क्या मैं तुम्हारी नौकरानी हूँ?" यह छोटा सा वाक्य सुनने में जितना साधारण लगता है, एक पुरुष के आत्मसम्मान और उसके द्वारा किए जा रहे त्याग पर उतना ही गहरा प्रहार करता है। यह लेख किसी के विरोध में नहीं, बल्कि सिक्के के उस दूसरे पहलू को सामने लाने का प्रयास है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। १. जिम्मेदारी बनाम अधिकार: एकतरफा तराजू समाज ने पुरुष के लिए 'प्रदाता' (Provider) की भूमिका पत्थर की लकीर की तरह तय कर दी है। घर की आर्थिक नींव रखना, हर बिल का भुगतान करना और परिवार का भविष्य सुरक्षित करना उसका प्राथमिक कर्तव्य माना जाता है। विडंबना देखिए,...