रंडी !

रंडी

जाने है हमारे घर को ,
बदन सौदा का मंडी ।
वैसे नाम में क्या रखा है ,
कहते है सब हमे - " रंडी " ।

रात के पहर में ,
होते है सब मग्न ।
कितना भी पहने वस्त्र ,
नजरो में है हम नग्न ।

हवस मिटाने आते सब ,
भुलाकर अपना धरम ।
वैश्य वृत्ती है कर्म हमारा ,
फिर कैसे हुए हम बेशरम ।।

क्या करे हम भी ,
पापी पेट का सवाल है ।
स्त्री श्रेणी में होकर भी,
फिर मचा क्यू बवाल है ।।

सदियों से चला आ रहा ,
यह एक कडवा सत्य है ।
शांत करे हम भूख को ,
बस यही एक तथ्य है ।।

क्यू दिया दुनिया ने ,
हमे यह पहचान ।
सदियों से हम तरस रहे ,
पाने के लिए सम्मान ।।

नहीं होता कोई भी ,
अच्छा या बुरा धंधा ।
खेल है ये विचारो का ,
जो करदे सोच को गंदा ।।

एक बात कहती हू अंत मे ,
हमे है खुद पर अभिमान ।
लेकर थोड़ा ज्ञान दोस्तों ,
और बन जाओ इंसान ।।

- संतोष पांडेय ✍

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