अलविदा " बर्फी "...

तुफानी मौसम था । सुबह से लगातार जोरों से वर्षा हो रही थी I मानो वर्षा बंद होने का नाम ही नहीं ले रही हो I उस समय, मैं सह परिवार अपने गाँव वाले घर पर था I इसी बीच, मुझे एक गिलहरी के चिल्लाने की आवाज आने लगी I पहले तो मुझे लगा की ये तो आम बात है, लेकिन फिर वो आवाज घर के बाहर स्थित नाली से आने लगी I मैं झट से छाता लेकर देखने गया की आखिर बात क्या है I तो मैंने देखा की गिलहरी का एक छोटा सा शिशु नाली में पड़ा भीग रहा है I ठीक उसी समय, टिंकल भैय्या आ गए और उसे अपने छत पर ले गए I उसे बिस्कुट और दूध भी दिया I फिर, वहां से बिना देरी किए मैं तुरंत उसे अपने घर ले आया I

थंडी के मारे वो काप रही थी I लगभग उसका पूरा बदन भीग चुका था I मैंने तुरंत एक सूखे कपडे मे उसे रख दिया I रुई से उसके शरीर को पोछा I उसे गरम जगह पर रखा। भाभी से मैं एक उन का मोजा मांग लाया, ताकि उसे थंडी ना लगे I उसके लिए एक बक्से में उसका घर बनाया I लेकिन फिर भी उसकी हालत इतनी खराब थी की मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या करु I अब तक उसकी आंखे भी खुली नहीं थी I मैंने इंटरनेट के माध्यम से कुछ जानकारियां हासिल की l जानकारियों के हिसाब से उसकी आयु १४ दिन की होगी I फिर, मैंने सार्वजनिक माध्यम के जरिए लोगों से मदत की गुहार लगायी l कई लोगों ने मेरा मार्गदर्शन किया I उन्हीं में से गोलुजी ने मुझे प्रथमेश का मोबाइल नंबर दिया, जो की एक प्रकृतिवादी ( Naturalist ) है I मैंने उसी रात उन्हें कॉल किया, और सारा हाल बता दिया l उन्होंने अपनी तरह से पूरी सहयता की I इसी तरह, मंजु ने भी मुझे एक आदित्य का फोन नंबर दिया, क्युकी पहले आदित्य के पास भी एक गिलहरी थी I फिर मैंने आदित्य से भी बात करके सारी जानकारी प्राप्त की।


फिर, पास ही के अस्पताल से मैंने एक सिरिंज खरीदा I उसी सिरिंज के सहारे मैंने उसे दूध पिलाया और फिर एक उम्मीद के साथ उसे उसके नए घर मे सुला दिया I

सवेरे उठते ही पहले मैंने उसका हाल चाल लिया I रात के मुकाबले अब काफी बेहतर लग रही थी I चल भी रही थी I मैंने सबसे पहले प्रथमेश को उसके हाल का एक वीडियो भेजा और ये मैं रोज करता था I उन्होंने कहा की सब ठीक है I ये सुनकर कुछ अच्छा लगा I हालाकि, वो खुद कुछ खाती पीती नहीं थी I उसे बस थोड़ा थोड़ा दूध पिलाना पडता था I उसका तो नामकरण भी हो चुका था - " बर्फी " I इसी तरह एक एक दिन बितने लगा I रोज सुबह और शाम को मैं उसे छत पर ले जाता था, ताकि अन्य गिलहरियों से उसका मिलना जुलना हो, और उसकी माताजी आकार उसे ले जाये I मानो, मेरे लिए यह एक दिनचर्या बन गया हो I मुझे अपना एक जिम्मेदारी जो पूरा करना था I

खाना पीना ठीक से ना होने की वजह से थोड़ी आलसी और कमजोर हो गयी थी I अनुभव ना होने की वजह से, और नए प्रजाति में आने की वजह से बर्फी का इंसानो के साथ कुछ खास लगाओ नहीं हो रहा था I इसी तरह आज उसका मेरे घर पर सातवा दिन था I रोज की आज भी मैंने उसे अपने छत पर घूमने के लिए उसे उसके घर से बाहर छोड़ दिया और मैं दूर खडा उसकी निगरानी कर रहा था I काफी गिलहरिया उसके पास आती और चली जाती थी I फिर काफी समय के बाद, एक गिलहरी उसके पास आई I उसके साथ लोट-पोट किया और उसे अपने मुँह से पकड़कर, उसे लेकर चली गई I


मुझे थोड़ा दुख अवश्य हुआ, लेकिन उससे भी अधिक खुशी हुई की वो अपनी माँ के पास चली गई l मुझे गर्व है की मैंने एक बच्चे को उसकी माँ से और माँ को उसके बच्चे से मिलवाया I

सात दिनों के लिए ही सही, लेकिन मुझे एक शिशु के पिता होने का दर्जा और अनुभव, दोनों प्राप्त हुए I

~ संतोष पांडेय ✍

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