मोनू हँसी, लेकिन ..

... वैसे तो हम सब बहुत ही थक चुके थे I पैदल यात्रा करके हालत तो पहले ही पंचर थी और ऊपर से धूप का भी कडा पहारा था I बस गाँव मे जाकर हमें खाना-पानी मिल जाये, यही सोचकर हम चले जा रहे थे I

लगभग दोपहर के १२:०० बजे हम गाँव मे पहुंचे, जहां हमारी बस खड़ी थी I सभी के आने के बाद हम झटपट से बाँध की ओर निकल पड़े I वहां, जब हम सबने ठंडे पानी से अपना हाथ मुह धोया, तब जाकर हमे थोड़ा-सा अच्छा महसूस हुआ I फिर वहां से हम होटल की ओर निकल पडे I होटल जाते हम सबने भर पेट खाना खाया और अपने पेट के भूखे चूहों को को शांत किया l बातों-ही-बातों में उसने अपना भ्रमणध्वनी निकाला और हमें अपनी कुछ लाजवाब तस्वीरें दिखाई I किन्तु, हकीकत तस्वीर से बिल्कुल अलग थी I बस उसी पल से मेरे मन में भी उसे जानने की जिज्ञासा जाग गई।

सबका खाना होने के बाद हम अपने शहर अर्थात घर की ओर निकल पड़े I पहले कुछ घंटे सभी ने आराम करने का फैसला किया और देखते ही देखते सभी लोग सो गए I वो भी बस के पीछे वाली सीट पर झपकियां ले रही थी I लेकिन मैं ठहरा शैतान, सफर भी लंबा था.. इसीलिए मैंने ठान लिया की इसे सोने नहीं देंगे अब I इसी के विपरित, वो तो एकदम शांत स्वभाव वाली थी I फिर मैंने और मेरे एक मित्र ने उस बिचारी को परेशान करने का पक्का नियोजन बनाया I गाने भी एकदम रोमांटिक बज रहे थे I मानो जैसे दिल मे नये अरमान जाग गए हों I इसी बीच मैं और मेरा वो मित्र भी गाना गाने लगे I हम बेसुरो का गाना सुन बिचारी के नींद उड़ गए I उसके बाद काफी देर तक हम लोगों ने गप्पा मस्ती किया, नृत्य भी किया और एक दुसरे को अपने जीवन की मजेदार कहानिया सुनाई I इसी के बीच उसने अपने हमे अपने बचपन की प्रेम कहानी का किस्सा बताया I हालाकि, वो किस्सा बस एक नादानी मात्र थी, लेकिन किस्सा मजेदार था I

किस्सा कुछ इस प्रकार था - " एक बार उसकी कक्षा के एक लड़के ने उसे पत्र दिया था I तब वो दोनों कक्षा चौथी में थे I पत्र को लिये रोती हुयी ये अपने घर गई और अपने माता-पिता को सारा हाल बताया I उसकी माताजी फौरन उस लड़के के घर गई और उसकी शिकायत उसके माता-पिता से की । उसके बाद उस लड़के की जमकर पिटाई हुई औ उसे इससे से दूर रहने को कहा गया I और सबसे मजे की बात तो ये है कि इसने आज भी उस पत्र को सम्भाले रखा है I "

सुनने में एकदम फिल्मी है ना !!, लेकिन यही सत्य है I लेकिन ये सुनकर मैं हार मानने वालों में से नहीं था I मैंने अपना प्रयत्न जारी रखा I बाद में उसने मेरे समझ दो प्रस्ताव रखे - पहला प्रस्ताव ये था कि वो मेरे बारे में तब सोचेंगी जब मैं उसके लिए एक पत्र लिखूँगा और दूसरा प्रस्ताव कुछ ऐसा था की मुझमे ५०% हरामपंती और ५०% अच्छाईया होनी चाहिए I सुनने में जितना सरल है, करना उतना ही मुश्किल था I फिर भी मैंने उसकी प्रस्तावों को स्विकार कर लिया । उसकी एक समस्या ये भी थी को वो अत्यंत भावुक स्वभाव की थी I कोई उसके अतीत और उसके बारे में जानें ये उसको पसंद नहीं था, लेकिन किसी ना किसी तरह मैं उसके बारे में धीरे धीरे जानने लगा था I

इसी तरह, कुछ हफ्तों के बाद फिर एक दिन हम उसी समूह के साथ घूमने के लिए गए थे I इस बार मैंने मन बना लिया था कि उसे अपने दिल की बात बताकर ही रहूँगा, चाहे जो भी हो जाए I घूम-फिरकर होने के बाद, वापसी के दौरान मैंने उसके समझ अपना प्रस्ताव रखा । पहले तो उसने मुझे बहुत समझाया I लेकिन मुझे हा या ना में जवाब चाहिए था I कुछ समय के लिए वो चुप सी हो गई I मैं भी उसके जवाब के इन्तेज़ार में चुप हो गया I बस के अधिकतर लोग उतर चुके थे I गिन चुनकर 3-4 लोग आगे की सीट पर बैठे थे I शाम का पहर था I आसमान भी एकदम नारंगी सा हो गया था I खिडकी से थंडी-थंडी हवाये भीतर आ रही थी । उसके सिर पर गिरनेवाला बोतल भी अब तक ऊपर ही अटका हुआ था I आस पास से गाड़ियों की आवाजें आ रही थी I मान लो की पूरी कायनात को उसके जवाब का इन्तेज़ार था I अंत मे सोच-विचारकर उसने वो शब्द बोला, जो की उसे सही लगा और वो शब्द था- " ना " I जी हा ! उसने हस्ते हुए मुझे ना बोल दिया I फिर क्या था,  उसके सिर पर गिरनेवाले बोतल की सुचना उसे मैंने दे दी । नारंगी शाम ने भी काला रूप धारण कर लिया I बस वाले ने भी गाना ऐसा लगाया की पूछो मत - " ठुकरा के मेरा प्यार... मेरा इन्तेगाम देखेगी... " और ये कायनात ! इसकी तो ऐसी की तैसी, इसपर से तो मेरा भरोसा ही उठा गया I इस प्रकार फिर एक बार मेरी प्रेम कहानी हसी भरा अंत हुआ I

उस दिन के बाद हम एक अच्छे दोस्त बन गए और उसका " Hawww ", " Owwww " , " Aiyeee " , " देवा " , " अगं बाई " वाला सिलसिला चालू हो गया I दुसरे दिन फिर एक नया सवेरा आया और मैं फिरसे उसकी तलाश में जुट गया I क्युकी, मैंने कहीं तो सुना है की कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती ।

~ संतोष पांडेय 

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