जगत जननी !

चाहिए सबको मा का कोख।
सुख के लिए करते संभोग।।

हमारे लिए बना मासिक धर्म।
कहते यह है पाप का कर्म।।

पूजे कहकर हमे दुर्गा भवानी।
भीतर से बोलते घर-कुल नासिनी।।

आसाम में हम है कामख्या देबी।
फिर क्यों बदनाम है हमारी छबी।।

फिल्में बनती कहकर मर्दानी।
फिर भी क्यू कहलाते सिर्फ जनानी।।

कहते सब हमे घर की शाम।
फिर पीछे क्यू हटते देने में ज्ञान।।

बोलते हमे मां रूपी भगवान।
फिर वंचित क्यू हम मिलने से सम्मान।।

जुडी है हमसे शक्ती पीठ की कड़ियां।
फिर क्यू बांधे हमे ये प्रथा रूढ़ियां।।

जो समझा वो बना इंसान।
नसमझो के लिए है ये कथा-पुराण।।

- संतोष पांडेय ✍

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