अये सिंघम !

" ... अये .... सिंघम "

वैसे आपको बता दू , ना मै अजय देवगन हूं और ना ही मेरा सिंघम चित्रपट से कोई लेना-देना है। वैसे मै कोई बॉडी बिल्डर भी नहीं हूं। मै एक सामान्य लड़का हूं और कम बोलना मेरी फितरत है। अब चलिए जानते है क्यू मुझे मेरे मित्र " ... अये .... सिंघम " बुलाते है।

बात कॉलेज के दिनों की है। मै एक ही नियम का पालन करता था और वो है - ना ज्यादा बोलना , ना किसी विषय में पड़ना। बस अपने काम से काम रखना। दुनिया को देखने का मेरा थोड़ा अलग अंदाज है। मेरा ये अंदाज काफी लोगो को के समझ के बाहर है। खैर छोड़िए , सबकी अपनी-अपनी सोच। एक दिन मै अपने मित्रों के साथ लेक्चर में बैठा था। क्या पता बीच में इन्हे कहा से दिमाग में आ गया कि सारे मिलकर मुझे सिंघम बोलने लगे। अब वैसे एक दूसरे को तो चिढ़ाना कॉलेज के दिनों में सामान्य बात है। आप इसे कॉलेज का रिवाज बोल सकते है। तो उस दिन कक्षा के कुछ अन्य लोगों ने भी यह सुन लिया। उन अन्य लोगो में था एक लड़का - पांडु । हा सही सुना आपने - पांडु !

धीरे-धीरे दिन बीतते गए और मेरे मित्र भी बनते गए। पांडु से भी मित्रता हो गई। वैसे मै और पांडु एक ही जगह रहते थे। और कॉलेज आने जाने में भी कभी कभी एक साथ मिल जाते थे। कुछ दिनों बाद कॉलेज में इवेंट का समय आया। उसमे मै भी एक इवेंट का इवेंट मैनेजर था। वहा पांडु भी था । लेकिन मुझे पांडु ज्यादा कुछ पसंद नहीं आता था। क्या पता क्यू , उसके किसी बातो से मै सहमत नहीं हो पाता था। उसके कारनामे भी कुछ उल्टे सीधे होते थे। लेकिन मुझे उससे क्या , सब मेरी तरह हो ऐसा जरूरी तो नहीं ना, इसीलिए जाने दीजिए उन बातो को। काफी अच्छा मैनेज किया हमने इवेंट। उसी इवेंट में एक लड़की भी थी , जो पांडु की दोस्त और मेरी क्लासमेट थी। हालाकि हमने कभी एक दूसरे से बात नहीं की थी , लेकिन उस इवेंट के दौरान हमारी बात एक दूसरे से हुई। उससे बात करके मुझे अच्छा लगा और मेरे मन के कुछ वहम भी दूर हो गए। पहले मै उस लड़की को थोड़ा घमंडी समझता था , क्युकी वो किसीसे बात ही नहीं कर करती थी। बस अपने गिने चुने मित्रो से ही बात करती थी वो। लेकिन उस इवेंट ने उस लड़की में लिए मेरे मन में एक अलग घर बना दिया। उससे मिलने के बाद एक अपनापन सा लगने लगा और मैंने ठान लिया कि आज से ये लड़की मेरी ताईंडे ( बहन )। उस दिन मुझे पता चला कि कभी कभी हम इंसान के कुछ स्वभाव से अपने मन में इस इंसान की एक प्रतिमा बना लेते है , जो हमेशा सही हो ऐसा नहीं होता।

अब बात ऐसा है कि , वो जो पांडु है ना वो हमेशा मुझे सिंघम बोलता था। उसका सुनकर ताईंडे भी मुझे सिंघम बोलने लगी। यहां तक कि वो वाट्सअप में भी मुझे शेर के चेहरे वाले इमोजी से दर्शाती थी और है। पांडु ताईंडे को इमोजी क्वीन बोलता था। क्युकी वो एमोजिस का इस्तेमाल बहुत करती थी और इस बात की पुष्टि मै खुद भी करता हूं। लेकिन मेरे लिए वो कोई इमोजी क्वीन नहीं थी , मेरे लिए तो वो मेरी ताईंडे ही थी और आज भी है। वो भी मुझे " ... अये .... सिंघम " बोलती थी और बोलती है। 

थोड़ी दिक्कत मुझे पांडु से भी थी , क्युकी वो ताईंडे को बहुत परेशान करता रहता था। मेरी उससे कोई दुश्मनी नहीं थी , बस कोई मेरी ताईंडे को परेशान करे मुझे बिल्कुल पसंद नहीं और ना सहन होता है। मुझे तो कई बार गुस्सा भी आया है और मैंने पांडु को चिल्लाया भी था। लेकिन उसका फिर भी वही स्वभाव रहता था। बहुत बड़बड़ करता था वह। उसे कितना भी राजा कहकर बोलो , करेगा वहीं जो उसे ठीक है। लेकिन दूसरी ओर पांडु और ताईंडे काफी अच्छे मित्र थे और आज भी है। साफ मन , अल्लड़ स्वभाव , बचकानी हरकते , अफाट बोलना, जिद्दपना और गुस्सा उसकी कुछ खासियत थी। लेकिन एक बात तो थी , पांडु कभी ताईंडे को नुक्सान नहीं पहुंचाता था। बस उसके ऊटपटांग हरकते मुझे नहीं भाती थी , बाकी सब ठीक था। लेकिन कहते है ना कि हर सिक्के के दो पहेलू होते है और दोनों भी एक दूसरे के साथ बंधे होते है , वैसे ही जीवन में मिलने वाले लोग भी होते है।

वैसे तो मै पुस्तक प्रेमी हूं , लेकिन कभी कभी जीवन में होनेवाली घटनाओं से भी बहुत कुछ सीख लेता हूं। सच मे , जीवन भी अजीब खेल खेलता है। कब , कैसे , कहा , कौनसे रिस्तो में हमे बांध देता है , हमे पता ही नहीं चलता।हर मोड़ पर हमे ऐसे रिश्तों का सामना करना पड़ता है , जो हमे अलग अलग सबक दे जाते है। रिश्ते और विश्वास पेड़-पौधों और जड़ों की तरह होते है। पौधों को सुरूवात में बड़े प्रेम और नाजुकता से संभालना पड़ता है , क्युकी उस समय उनकी के कमजोर होती है। जब वो पौधा पेड़ बन जाता है , तब उसकी जड़ें भी मजबूत हो जाती है। ठीक उसी तरह , जैसे रिश्तों में विश्वास की जड़ों का मजबूत होना आवश्यक होता है। हालाकि की लोग रिश्तों को मोह-माया कहते है , लेकिन मेरे लिए रिश्तों के मायने इन सबसे ऊपर है। एक बार मै किसी से रिश्ता बना लू , तो अपने आखरी दम तक उसे निभाने का कोशिश करता हूं और करता रहूंगा।

मेरा तो एक ही मानना है की - " कालची वेळ गेलेली आहे. उद्या अद्याप आलेला नाही. आजच आपल्याकडे आहे. चला चांगल्या गोष्टींचा प्रारंभ करूया. "

मै हूं ,
सिंघम 

- संतोष पांडेय ✍

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