भुक्कड़ कोंबडी !
" ... इसीलिए मुझे बोलते है - भुक्कड़ कोंबडी 🐔 "
" आ-गं, कोंबडी पळाली, तंगडी धरून, लंगडी घालाय लागली " - ये गाना आप सभी ने अनेक बार सुना होगा , वीडियो देखा होगा ओर इसपर नाचा भी होगा। अब आप सभी कहेंगे कि इसमें नया क्या है। सच बोलू तो इसमें कुछ नया नही है , लेकिन इस गाने में जो मुर्गियों को आप देखते है , उनसे मेरा जन्मों का नाता है। बस फर्क ये है कि वो जानवर की श्रेणी में गिने जाते है और मै इंसानों के। लेकिन प्रजाती हमारी एक जैसी है और वो है " कोंबडी ( मुर्गी ) प्रजाती "। अब लगा ना आप सभी को झटका। लेकिन यही सत्य है। चलिए जानते है कि कैसे एक इंसान की गिनती मुर्गियों में होने लगी।
हा , तो बात उस समय की है जब मै भी अपने गांव से हजारों सपनों को संजोए विद्या की नगरी पुणे में आयी थी। वैसे आज बहुत लोगो का कहना है कि अभियांत्रिकी करना तो बच्चो का काम है। लेकिन मै बताना चाहती हूं कि एक बार इस क्षेत्र में कदम रखकर तो देखिए , पैरों तले जमीन खिसक जाएगी आपके। खैर बाकी तो आपको पता ही होगा। बड़े उत्साह के साथ मैंने भी अपने अभियांत्रिकी जीवन का प्रारंभ किया था। अभियांत्रिकी कॉलेज में प्रवेश मिला और ४ वर्ष की लंबी दौड़ सुरु हो गई। इस ४ वर्ष की लंबी दौड़ में ना बहुत कुछ होता है। जीवन की रेखा यहां से वहां हो जाती है।
अब कॉलेज है , तो दोस्त बनेंगे , दुश्मन बनेंगे , क्रश मिलेंगे , तो कभी सामने से प्रपोज मिलेगा। हसीए मत , इस दौर से सभी गुजरते है। इसी ४ वर्ष की दौड़ में मुझे मिला मेरे जिंदगी का सबसे बड़ा " धप्पा " , और वो था एक दोस्त। कोई आम दोस्त नहीं , नाक में दम करदे ऐसा दोस्त था वो और अभी भी है। वैसे बोलना तो नहीं चाहिए , लेकिन महा संकी , जिद्दी , गुस्सावला और दोस्तो के लिए कुछ भी कर बैठे ऐसा था वो। वैसे उसकी बुद्धि क्षमता काफी अच्छी थी और खेल कूद में भी अच्छा था। ऐसी कोई बात नहीं दिखाइ दी उसमे मुझे , जिससे मै उसे दोस्त ना बनाऊ। बस फिर, बन गए हम दोस्त।
आगे क्या था - उसी दिन से मेरा मुर्गी बनने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई। इसने मेरा नाम " कोंबडी " रख दिया। चलो नाम रखा तो रखा , सारी दुनिया को भी बता दिया। हजार बार मैंने इसे मना किया कि मत बोल ये मुझे , लेकिन कहा वो माननेवाला था। उसका सुनकर धीरे-धीरे सभी मुझे कोंबडी बोलने लगे। और फिर मेरा ऑफिशियल नाम बन गया - " कोंबडी "। आगे फिर होटल में भी मुझे ही चिढाया जाता था। किसने चिकन ऑर्डर किया तो भी ये लोग मेरे पास ही देखते थे। जैसे कि मुझे ही पकाकर खाएंगे। कहीं घूमने भी गए और इन्हे अगर मुर्गियां दिख गई , तो ये सारे सुरु हो जाते थे। १-२ बार तो मै रोई भी थी इस नाम को लेकर। लेकिन बाद में आदत सी हो गई ये नाम सुनने कि।
आज भी मेरा नाम उसके मोबाइल में " भुक्कड़ कोंबडी " करके रक्षित है। अब ये भुक्कड़ का चलो मैं ही बता देती हूं। मुझे ना भूक बहुत जल्दी लगती है। कम से कम दिन में ४-५ बार तो खाना खाती ही हूं। इसी वजह से ये लोग मुझे भुक्कड़ कहते है।इन सारी घटनायो की वजह से सारे मुर्गी समाज ने मुझसे दुश्मनी ले ली है। हमेशा मुझे खुन्नस से ही देखते है। समझ लीजिए कि जो उन्हें मारकर खाता है उससे अधिक उन्हें मुझसे दिक्कत है। आखिर उनका सारा श्रेय जो मुझे मिल रहा।
एक बात बता दू आपको - मेरी इस दशा का श्रेय जाता है लेखक महोदय को, क्युकी यही वो दोस्त है जिसने मेरा नया नामकरण किया था। अब तो एक ही बात बोल सकती हूं - " गेले ते दिवस ; राहिले ते माझा नाव , तो मूर्ख लेखक आणि आठवणी "
एक संदेश देना चाहती हू मैं सारे बेजुबान जीवों की तरफ से की आप जिवहत्या ना करे और ना इन्हे खाने में इस्तेमाल करे। क्युकी आप लोगो द्वारा इन जीवों का डिमांड है , इसलिए इनकी हत्या की जाती है। अगर आप सभी ने इन्हे खाना बंद कर दिया , तो इनकी हत्या और बिक्री पर भी रोक लग जाएगी। आप उनकी जगह खुदको रखकर देखिए और सोचिए। जब हम इंसानों के पास जीने खाने के लिए अन्य पर्याय है , तो फिर ये जीव हत्या क्यू ? इस विश्व में ना जाने कितने हजारों पशुओ की बलि यू ही दे दी जाती है। उनमें से सबसे बड़ा कम्युनिटी मांसाहारी खानेवालों की है। देखिए , मेरा मांसाहारियों से कोई विरोध नहीं , लेकिन हर एक बात की सीमा होती है और वो सीमा हम इंसान पार कर चुके है। हम सब की तरह ये भी इस प्रकृति के अंग है और इन्हे भी स्वतंत्रता से जीने का हक है। इसीलिए - " आप सब भी जिए और अन्य प्राणियों को भी जीने दे "।
मै एक,
भुक्कड़ कोंबडी 🐔
- संतोष पांडेय ✍
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