हां, मैं एक लड़की हूं ...
हां, मैं एक लड़की हूं ...
मेरा खुले आसमान में उड़ना ,
तुमको क्यों नहीं सुहाता ?
यह मत करो, वह मत करो ,
हर कोई मुझे यही समझाता।
हां, मैं एक लड़की हूं ...
मेरा पैदा होना भी ,
क्या कोई पाप है ?
आजादी तो मिली नहीं ,
लगता है ये कोई श्राप है ।
हां, मैं एक लड़की हूं ...
ख़्वाब होते हुए भी ,
बंधी हू मै जंजीरों से ।
कब तक हम खुदको बचाए ,
दुनिया की बाज रूपी नज़रों से ।
हां , मैं एक लड़की हूं ...
देवी कहकर सब पूजते है ,
दिया है उपाधि माता का ।
सहना सब कुछ चुप रह कर तू ।
हर कोई है यही बताता ।
हां, मैं एक लड़की हूं ...
कहते है सब यही है मेरी किस्मत ,
फिर मुझे दुनिया में लाया कौन ?
बेटी होती है पराया धन ।
ऐसा भ्रम समाज में फैलाया कौन ?
हां, मैं एक लड़की हूं ...
इस खुले आसमान में ,
अभी बहुत ऊंचा उड़ना है ।
मालूम है मुझको मेरी हद ,
फिर भी मुझे आगे बढ़ना है ।
हां, मैं एक लड़की हू ...
काश मेरे सपनों को भी ,
कोई तो आकर पंख लगाता ।
तू तो है मेरी लाडली बेटी ,
ऐसा कहकर कोई मुझे भी अपनाता ।
हां, मैं एक लड़की हूं ...
हम भी है अंश प्रकृति के ,
नहीं सहेंगे अब अत्याचार ।
करने फिर से जलिमो का खात्मा ,
ले लूंगी मै दुर्गा अवतार ।
हां, मैं एक लड़की हूं ...
- संतोष पांडेय ✍
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