फिरती हुई शीट्टी !

मै फिरती हूं। प्यार से मेरा भाई मुझे शीट्टी बोलता है।

वैसे मै खुद में ही खोई रहती हूं। दुनिया से तो मुझे कोई लेना देना भी नहीं है। मेरी एक समस्या ऐसी है कि जिंदगी में मै कंफ्यूज रहती हूं। क्या करू , क्या ना करू निर्धारित ही नहीं कर पाती।मेरी हरकते भी बचकानी होती है। इसीलिए मुझे बालिश बालिश चिड़ाते है। बचपन से ही गलियों में खेलकर बड़ी हुई हूं। आप मुझे अल्लड बोल सकते हो। बड़ो छोटो का ज्यादा ज्ञान नहीं मुझे। एकदम बिंधास्त रहती हूं। मेरे पैर एक जगह टिक ही नहीं पाते। बंदरों की तरह यहां से वहां फुदकते रहती हूं। हसना बोलना मुझे काफी पसंद है , लेकिन सिर्फ अपनो से। कभी कभी खुद से भी बाते करती रहती हूं। वैसे पुराने गानों का काफी शौक है मुझे। शायद यही कारण होगा की मुझे फिरती या शीट्टी कहा जाता है।

एक दिन हमारी गल्ली में एक नया परिवार रहने के लिए आया। बातचीत से पता चला कि वे लोग हमारे ही प्रदेश के है। इसी की वजह से हमारे माता पिता का एक दूसरे से मिलना जुलना होता रहता था। काफी अच्छे लोग थे। उनका बड़ा लड़का और मेरे चाचाजी काफी अच्छे मित्रा बन गए थे। उसकी बाते काफी अलग होती है। पढ़ने में भी अच्छा , कलाकारी में भी निपुण था , इसीलिए वो मुझे भा गया। मुझे उसकी माता से पता चला कि उनके दोनो बेटो की कोई बहन नहीं है। तो उसी दिन मैंने ठान लिया कि आज से ये दोनों मेरे भाई है। धीरे धीरे मै भी उससे पढ़ाई के संदर्भ में बात करने लगी। वो मुझसे ३ - ४ वर्ष बड़ा था , लेकिन हमारा पढ़ाई का क्षेत्र एक जैसा था। दोनो ही विज्ञान एवं गणित के विद्यार्थी थे। वैसे मै उससे काफी लड़ाई भी करती थी। बिलकुल एक छोटी बहन की तरह। आखिर मेरा हक है वो।

एक बात तो थी , उससे कभी भी मदद मांग लो , ना नहीं कहेगा। लेकिन सीधे सीधे मदद भी नहीं करेगा। बस वो मुझे मार्ग दिखाता था। क्युकी उसका मानना था कि व्यक्ति को अपने काम खुद करने चाहिए , और अपने लिए मार्ग भी खुद बनाना चाहिए। क्युकी दूसरो के बताए विचार और मार्गो पर हम वैसे भी चलते है। उसकी बाते मुझे कभी कभी समझ नहीं आती थी , लेकिन मुझे प्रेरणा जरूर मिलती थी। मेरी एक कमजोरी ये भी है कि किसी बी बातो का टेंशन मुझे जल्दी हो जाता है। धैर्य नाम कि चीज तो है कि नहीं। खासकर परीक्षा की दिनों में मुझे बहुत टेंशन आता है। यहां तक कि मै बीमार भी हो जाती हूं। मुझे कुछ लोगो के व्यक्तिमत्व काफी पसंद आता है। मेरे क्रश भी है , जो ऐसी उम्र में स्वाभाविक है। लेकिन कभी उनसे बात करने की हिम्मत नहीं हुई।

आखिर लड़की हूं ना , डर होता है कि बवाल ना जाए। वैसे लड़की होने के परिणाम तो आप सभी जानते ही है। अब एक लड़का लड़की एकसाथ बोले तो कुछ लोगो के आंखो में काटे तो चुभेंगे ही ना। ऐसे कुछ लोग हमारे गाल्ली में भी थे। खैर जाने दीजिए ये बाते , ये सब तो समाज में स्वाभाविक है। काफी सारी बातो का ध्यान रखना पड़ता है। आजकल हमे लेकर कानून बहुत बनाए गए है , लेकिन समाज में हमारी छबी आज भी वैसी ही है।

एक बात तो तय है , जीवन में उम्र , लोग , पैसा , देश ,समय , कानून सब कुछ बदलेगा , लेकिन समाज की सोच कभी नहीं बदलेगी। समाज की धारणा हम लोगो के लिए कभी नहीं बदलेगी। आज भी लड़कियों को उनका अधिकार नहीं मिल।पाता। आज भी में सही मायने में स्वतंत्र नहीं है। सामाजिक बेड़ियों में बंधे हुए है। आज भी कई घरों में लिंग के आधार पर भेदभाव होता है। वैसे है तो हम दुर्गा अवतार , लेकिन सच्चाई एकदम परे है। खुश नसीब है वो लड़कियां जो अपनी जिंदगी स्वतंत्रता से जी पाती है। 

चलिए छोड़ियर ये सब बाते , ये सब होते ही रहते है। अब मम्मी ने बुलाया है मुझे , पानी भरने का समय हो गया है ना।

एक गुमनाम ,
शीट्टी

- संतोष पांडेय ✍

Comments

Popular posts from this blog

When Men Are Not Allowed to Break 💔

"Dear Self, I will win, I promise!"

"When Men Break Down: The Untold Struggles Behind the Silence, the Outburst, and the Blame"